दुर्ग-गोंडपेंड्री में 45 वर्षों से नहीं जली होलिका: आस्था-परंपरा ने बदल दी परंपरागत होली की आग
दुर्ग। छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के गोंडपेंड्री गाँव में इस फ़रवरी/मार्च 2026 की होली से पहले एक अनोखी परंपरा का ज़िक्र फिर से चर्चा में है। यहाँ के ग्रामीण पिछले लगभग 45 वर्षों से पारंपरिक होलिका दहन (फागुन पूर्णिमा की रात को होलिका जलाने की परंपरा) नहीं करते। आमतौर पर पूरे भारत में होलिका दहन बुराई पर अच्छाई की जीत और प्रह्लाद-होलिका की कथा के प्रतीक रूप में मनाया जाता है, लेकिन इस गाँव में अग्नि को जलाने का रिवाज़ वर्षों से विराम पर है।
क्यों नहीं जलती होलिका?
स्थानीय लोगों के अनुसार, गाँव में पुरानी पीढ़ियों ने यह निर्णय इसलिए लिया कि आग जलाने से नुकसान और जोखिम हो सकता है। इससे जुड़ी मान्यता यह है कि अगर होलिका जलाने की परंपरा को तोड़ा गया, तो नुकसान या विपत्ति हो सकती है – इसलिए होलिका दहन को वर्षों से सख़्ती से टाला जा रहा है। लोग होली के दिन रंग-गुलाल और खुशियों के साथ सामाजिक मिलन तो करते हैं, लेकिन पारंपरिक होलिका को नहीं जलाते।
गाँव के बुज़ुर्गों ने यह निर्णय कई दशक पहले ही लिया था और आज के युवा भी इसे सम्मान देते हैं। वे मानते हैं कि पहले पीढ़ियों ने जो आस्था से जुड़ा नियम बनाया था, उसे बनाए रखना ही बेहतर है। इस प्रकार पारंपरिक होलिका दहन को ‘अग्नि-शक्ति’ के रूप में नहीं, बल्कि गाँव की आस्था-परंपरा के अनुसार देखा जाता है।
गाँव में होली के अवसर पर होलिका न जलने की परंपरा एक सामाजिक पहचान बन चुकी है। लोग इसे आस्था का प्रतीक मानते हैं, न कि सिर्फ त्योहार का एक अध्याय। भले ही यह देश के अन्य हिस्सों में होलिका दहन की भव्य परंपरा के विपरीत है, लेकिन गोंडपेंड्री के लोग इसके पीछे की भावना को गम्भीरता से लेते हैं।
भारत में कई जगहों पर होलिका दहन की विविध परंपराएं मिलती हैं – कुछ स्थानों पर यह बड़ी भव्यता से मनाया जाता है, तो कहीं प्रकृति और पर्यावरण को प्राथमिकता देते हुए अलग तरीके अपनाए जाते हैं। उदाहरण के लिए राजस्थान के हरनी कलां में होलिका जलाने के बजाय चांदी की प्रतिमा पूजा जाती है, ताकि धुएँ और आग से बचा जा सके।
कुल मिलाकर गोंडपेंड्री गाँव में लगभग 45 वर्ष से होलिका दहन नहीं किया जाता है।
यह निर्णय पिछले बुज़ुर्गों द्वारा लिया गया था और आज भी युवा इसका सम्मान करते हैं।
गाँव की आस्था-परंपरा और सुरक्षा-मानसिकता इसके प्रमुख कारण हैं।
देश में अन्य जगहों पर होलिका दहन की अलग-अलग पद्धतियाँ देखने को मिलती हैं।