कच्चे तेल की वैश्विक कीमतों में उछाल के बावजूद आम लोगों को राहत देने की कोशिश, तेल कंपनियों और सरकारी राजस्व पर पड़ा भारी दबाव,
नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल के बावजूद भारत ने पेट्रोल-डीजल की कीमतों को अपेक्षाकृत नियंत्रित रखने के लिए बड़ा आर्थिक बोझ उठाया है। एक रिपोर्ट के अनुसार सरकार और सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों ने उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए करीब 1.23 लाख करोड़ रुपये का भार वहन किया।
रिपोर्ट के मुताबिक पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने से वैश्विक ऊर्जा बाजार प्रभावित हुआ और कच्चे तेल की आपूर्ति को लेकर चिंताएं बढ़ गईं। विशेष रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास पैदा हुए संकट ने तेल कीमतों को ऊपर धकेला, जिसका असर दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ा।
इसके बावजूद भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी कई अन्य देशों की तुलना में सीमित रखी गई। इसके लिए सार्वजनिक क्षेत्र की तेल विपणन कंपनियों ने लंबे समय तक बढ़ी हुई लागत का बड़ा हिस्सा खुद वहन किया, जबकि सरकार ने भी करों और अन्य उपायों के जरिए राहत देने का प्रयास किया।
विशेषज्ञों का कहना है कि ईंधन कीमतों को नियंत्रित रखने से महंगाई पर काबू पाने में मदद मिली, लेकिन इसका असर सरकारी वित्तीय स्थिति और तेल कंपनियों की आय पर पड़ा। उर्वरक सब्सिडी, आयात बिल और राजकोषीय घाटे पर भी अतिरिक्त दबाव बनने की आशंका जताई जा रही है।
सरकार का मानना है कि वैश्विक हालात सामान्य होने और तेल आपूर्ति में सुधार आने पर कीमतों का दबाव कम हो सकता है। फिलहाल भारत ऊर्जा सुरक्षा बनाए रखने और घरेलू बाजार को बड़े झटकों से बचाने की रणनीति पर काम कर रहा है।