दंतेवाड़ा में नक्सलवाद की कमर टूटी: 63 कुख्यात नक्सलियों ने एक साथ किया आत्मसमर्पण, ₹1.19 करोड़ के थे इनामी…

दंतेवाड़ा। छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित बस्तर अंचल में नक्सलवाद के खिलाफ चल रही निर्णायक लड़ाई को बड़ी सफलता मिली है। वर्षों तक जंगलों में रहकर हिंसा, आतंक और खून-खराबे का पर्याय बने 63 हार्डकोर नक्सलियों ने सामूहिक रूप से हथियार डाल दिए। आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों पर कुल मिलाकर 1 करोड़ 19 लाख रुपये का इनाम घोषित था।

यह आत्मसमर्पण न केवल संख्या के लिहाज से बल्कि कैडर और रैंक के स्तर पर भी बेहद अहम माना जा रहा है, क्योंकि इसमें संगठन के शीर्ष और मध्य स्तर के कमांडर शामिल हैं।

पुलिस अधिकारियों के मुताबिक आत्मसमर्पण करने वालों में- DVCM (डिविजनल कमेटी मेंबर), ACM (एरिया कमेटी मेंबर), मिलिशिया कमांडर
सक्रिय सशस्त्र कैडर शामिल हैं, जो वर्षों से नक्सल संगठन की रणनीति, हमलों की योजना और दस्तों के संचालन में अहम भूमिका निभा रहे थे।

आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों में प्रमुख नाम इस प्रकार हैं-

अशोक पोचा सडमेक उर्फ चंद्रशेखर – DVCM, उम्र लगभग 63 वर्ष
(लंबे समय तक संगठन की डिविजनल गतिविधियों का संचालन करता रहा)

वनिता दोहे जोरे – ACM, उम्र लगभग 54 वर्ष (महिला कैडर के संगठन और सप्लाई नेटवर्क में थी सक्रिय) साधु (उपनाम) – ACM, लच्छू/लक्ष्मण (उपनाम) – मिलिशिया कमांडर। देवा कवासी, सुक्की मंडावी, रामे पूनेम, मुचाकी भीमा, जोगा कवासी सहित कुल 63 नक्सली, सूत्रों के अनुसार, इनमें कई महिला नक्सली भी शामिल हैं, जो वर्षों से सशस्त्र दस्तों के साथ जंगलों में सक्रिय थीं।

पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक ये नक्सली:-

आईईडी ब्लास्ट लगाने, सुरक्षाबलों पर घात लगाकर हमले, सड़क निर्माण कार्यों में बाधा, ग्रामीणों को धमकाने और संगठन में जबरन भर्ती, जैसी दर्जनों गंभीर घटनाओं में शामिल रहे हैं। इनकी सक्रियता जगरगुंडा, टेकलगुड़ा, मिनपा, अरनपुर और आसपास के दुर्गम इलाकों में रही है।

अधिकारियों का कहना है कि राज्य सरकार की “पुना मार्गेम” (नए रास्ते की ओर) नीति, लगातार दबाव, जंगलों में कमजोर होता संगठन और विकास कार्यों के विस्तार ने नक्सलियों को आत्मसमर्पण के लिए मजबूर किया।

नक्सलियों ने स्वीकार किया कि- संगठन अब पहले जैसा मजबूत नहीं रहा,
नेतृत्व में आपसी अविश्वास बढ़ा, जंगलों में जीवन कठिन होता जा रहा है

सरकार की नीति के तहत आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों को-
तत्काल आर्थिक सहायता, पुनर्वास पैकेज, आवास, शिक्षा और रोजगार से जोड़ने की सुविधा, कौशल विकास प्रशिक्षण प्रदान किया जाएगा, ताकि वे हिंसा का रास्ता छोड़कर सामान्य सामाजिक जीवन अपना सकें।

वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने इसे नक्सल संगठन के लिए बड़ा मनोवैज्ञानिक झटका बताया है। उनका कहना है कि वरिष्ठ कैडर के हथियार डालने से संगठन का नेटवर्क और मनोबल दोनों कमजोर होंगे।

लगातार हो रहे आत्मसमर्पण यह संकेत दे रहे हैं कि बस्तर अब बंदूक नहीं, विकास और संवाद की राह पर आगे बढ़ रहा है।

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