सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी: आपसी सहमति से बने संबंध चरित्र हनन का आधार नहीं
नई दिल्ली। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि दो वयस्क अविवाहित लोगों के बीच आपसी सहमति से बने शारीरिक संबंधों को किसी व्यक्ति के खराब चरित्र या नैतिक पतन का आधार नहीं माना जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति के निजी जीवन को उसकी पेशेवर योग्यता से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए।
यह टिप्पणी उस मामले की सुनवाई के दौरान आई, जिसमें एक पुलिस कांस्टेबल अभ्यर्थी का प्रोविजनल चयन रद्द कर दिया गया था। उस पर एक पूर्व प्रेम संबंध से जुड़े आरोपों के आधार पर ‘चरित्रहीनता’ और ‘नैतिक अधमता’ (Moral Turpitude) का आरोप लगाया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने चयन रद्द करने के फैसले को गलत ठहराते हुए अभ्यर्थी को राहत दी।
जस्टिस Manmohan और जस्टिस Manoj Misra की पीठ ने कहा कि किसी असफल प्रेम संबंध या सहमति से बने निजी रिश्ते को किसी व्यक्ति के चरित्र का पैमाना नहीं बनाया जा सकता। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में तथ्यों और परिस्थितियों का निष्पक्ष मूल्यांकन जरूरी है।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह फैसला सरकारी नौकरियों में चरित्र सत्यापन और भर्ती प्रक्रियाओं से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण मिसाल साबित हो सकता है। अदालत ने संकेत दिया कि निजी जीवन से जुड़े सहमति आधारित संबंधों के आधार पर किसी उम्मीदवार के भविष्य और करियर को प्रभावित नहीं किया जाना चाहिए।