हरी खाद से कम होगी लागत और बढ़ेगी पैदावार…

रायपुर। बढ़ती खेती लागत और घटती मिट्टी की उर्वरता के बीच हरी खाद किसानों के लिए नई उम्मीद बनकर सामने आई है। कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केन्द्र, रायगढ़ के वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि किसान रासायनिक उर्वरकों पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय हरी खाद और हरी पत्तियों की खाद को अपनाएं तो न केवल मिट्टी की सेहत सुधरेगी, बल्कि खेती भी अधिक लाभकारी बनेगी।

वैज्ञानिकों के अनुसार ढैंचा, सनई, मूंग, उड़द, लोबिया और ग्वार जैसी दलहनी फसलें 35 से 45 दिन बाद खेत में मिलाने से प्राकृतिक जैविक खाद में बदल जाती हैं। इससे प्रति हेक्टेयर 50 से 60 किलोग्राम तक नाइट्रोजन की पूर्ति होती है। वहीं नीम, करंज, ग्लिरिसिडिया और सहजन की हरी पत्तियां भी मिट्टी में जैविक तत्व और लाभकारी सूक्ष्मजीवों की सक्रियता बढ़ाती हैं।

इस प्राकृतिक तकनीक का सबसे बड़ा लाभ यह है कि रासायनिक उर्वरकों की जरूरत घटने से खेती की लागत कम होती है, जबकि फसलों की उपज में 15 से 20 प्रतिशत तक बढ़ोतरी देखी गई है। धान की गुणवत्ता में भी सुधार और पोषक तत्वों की मात्रा बढ़ने के सकारात्मक परिणाम मिले हैं।

वैज्ञानिकों ने किसानों से हरी खाद और ब्राउन मैन्योरिंग जैसी तकनीकों को अपनाकर मिट्टी की सेहत बचाने, पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देने और टिकाऊ कृषि की दिशा में आगे बढ़ने की अपील की है।

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