बस्तर। बस्तर की धरती, जो कभी नक्सली हिंसा की सबसे बड़ी प्रयोगशाला मानी जाती थी, अब एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ी है। प्रतिबंधित संगठन CPI (माओवादी) के शीर्ष नेता और 131 जवानों की हत्या के आरोपों से घिरे कुख्यात नक्सली कमांडर देवजी उर्फ थिप्पिरी तिरुपति ने आत्मसमर्पण कर दिया है।
यह सरेंडर सिर्फ एक व्यक्ति का हथियार डालना नहीं, बल्कि बस्तर में बदलते समीकरणों का संकेत है।
कहां और कैसे हुआ सरेंडर?
जानकारी के मुताबिक देवजी ने तेलंगाना में सुरक्षा एजेंसियों के सामने आत्मसमर्पण किया। पूरा ऑपरेशन तेलंगाना पुलिस की निगरानी में हुआ।
बताया जा रहा है कि उसके साथ कई अन्य सक्रिय माओवादी भी सामने आए। यह घटनाक्रम उस समय हुआ है जब बस्तर क्षेत्र में लगातार सुरक्षाबलों का दबाव बढ़ाया गया है।
देवजी का नाम कई बड़े नक्सली हमलों से जुड़ा रहा है, जिनमें सुरक्षाबलों को भारी नुकसान उठाना पड़ा। बस्तर, दंतेवाड़ा, सुकमा और सीमावर्ती जंगलों में उसकी पकड़ मजबूत मानी जाती थी।
बस्तर लंबे समय तक माओवादी रणनीति का मुख्य केंद्र रहा, और देवजी को वहां का प्रमुख सैन्य रणनीतिकार माना जाता था।
क्या अब बारी रमन्ना और मिसिर बेसरा की?
सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि अब संगठन के शेष बड़े चेहरों पर भी दबाव है। जिन नामों की चर्चा तेज है, उनमें शामिल हैं:
मिसिर बेसरा
रामन्ना
यदि ये भी सरेंडर करते हैं या मुठभेड़ में मारे जाते हैं, तो माओवादी ढांचे को निर्णायक झटका लग सकता है।
सरकारी दावों के अनुसार अब बस्तर संभाग में सक्रिय नक्सलियों की संख्या करीब 200 के आसपास रह गई है। पहले जहां हजारों की संख्या में कैडर सक्रिय थे, अब संगठन का शीर्ष ढांचा कमजोर पड़ता दिख रहा है।
बड़ा सवाल: क्या सच में खत्म होगा नक्सलवाद?
देवजी का सरेंडर तीन बड़े संकेत देता है:
1. नेतृत्व संकट: शीर्ष कमांडर हथियार डाल रहे हैं।
2. सुरक्षाबलों की बढ़त: लगातार ऑपरेशन और इंटेलिजेंस मजबूत हुई है।
3. आंतरिक टूट: संगठन के भीतर मतभेद और मनोबल गिरा है।
लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि नक्सलवाद सिर्फ बंदूक का मुद्दा नहीं, बल्कि विकास, स्थानीय असंतोष और राजनीतिक विश्वास का भी प्रश्न है।
यदि प्रशासन जमीनी विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार पर समानांतर काम करता है, तभी यह सरेंडर स्थायी शांति में बदलेगा।
कुल मिलाकर देवजी का आत्मसमर्पण बस्तर के इतिहास में एक बड़ा मोड़ है।
यह संदेश है कि बंदूक की राजनीति अब कमजोर पड़ रही है।
लेकिन अंतिम जीत तभी मानी जाएगी जब बस्तर की पहचान जंगल और जनजातीय संस्कृति से होगी – न कि बारूद और बंदूक से।