शिंदे गुट ने बहुमत और संगठनात्मक समर्थन को बताया आधार, कोर्ट ने पूछा- क्या चुनाव आयोग ने सभी संभावित विकल्पों पर किया था विचार?
नई दिल्ली। शिवसेना के नाम और चुनाव चिह्न ‘धनुष-बाण’ को लेकर उद्धव ठाकरे और एकनाथ शिंदे गुट के बीच चल रहा विवाद अब सुप्रीम कोर्ट में निर्णायक सुनवाई के दौर में है। गुरुवार को मामले की सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने चुनाव आयोग के उस फैसले को लेकर महत्वपूर्ण सवाल उठाए, जिसके तहत 2023 में एकनाथ शिंदे गुट को शिवसेना का नाम और ‘धनुष-बाण’ चुनाव चिह्न दिया गया था।
सुप्रीम कोर्ट की पीठ में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के साथ न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना शामिल हैं। अदालत में शिंदे गुट की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल ने चुनाव आयोग के फैसले का बचाव किया। उन्होंने दलील दी कि शिंदे गुट के साथ विधायकों, सांसदों, कार्यकर्ताओं और संगठनात्मक इकाइयों का बहुमत था।
कोर्ट ने उठाया अहम सवाल
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने सवाल किया कि यदि चुनाव आयोग के सामने उपलब्ध परीक्षणों को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं थी, तो दोनों गुटों को अलग-अलग नाम और चुनाव चिह्न देकर अपने दम पर चुनाव लड़ने का विकल्प क्यों नहीं दिया गया।
अदालत ने इस बात पर भी विचार किया कि क्या चुनाव आयोग ने सभी प्रासंगिक विकल्पों पर पर्याप्त रूप से विचार किया था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह चुनाव आयोग के विवेक की जगह अपना विवेक नहीं रख रही, लेकिन न्यायिक समीक्षा के तहत यह जांचना जरूरी है कि आयोग ने अपने विवेक का इस्तेमाल किस तरह किया और क्या संभावित विकल्पों पर विचार हुआ था।
शिंदे गुट ने बहुमत को बनाया आधार
शिंदे गुट की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल ने दलील दी कि चुनाव आयोग को राजनीतिक दल के संविधान, संगठनात्मक ढांचे और विधायी इकाई की स्थिति को देखते हुए यह तय करने का अधिकार है कि कौन-सा गुट पार्टी का प्रतिनिधित्व करता है।
उनका तर्क था कि किसी राजनीतिक दल के प्रत्येक सदस्य के बीच जनमत संग्रह कराना व्यावहारिक नहीं है। ऐसे में पार्टी के कैडर, जमीनी कार्यकर्ताओं और संगठनात्मक समर्थन को भी ध्यान में रखा जा सकता है।
2023 में चुनाव आयोग ने शिंदे गुट को दिया था नाम और धनुष-बाण
शिवसेना में जून 2022 में विभाजन के बाद दोनों गुटों ने खुद को असली शिवसेना बताया था। चुनाव आयोग ने फरवरी 2023 में शिंदे गुट को शिवसेना का नाम और ‘धनुष-बाण’ चुनाव चिह्न देने का फैसला किया था। उद्धव ठाकरे गुट ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।
मामला सिर्फ चुनाव चिह्न तक सीमित नहीं है। सुप्रीम कोर्ट महाराष्ट्र विधानसभा अध्यक्ष के उस फैसले से जुड़ी याचिकाओं पर भी सुनवाई कर रहा है, जिसमें शिंदे गुट के विधायकों की अयोग्यता से संबंधित याचिकाओं पर निर्णय दिया गया था।
अगली सुनवाई 22 सितंबर को
सुप्रीम कोर्ट में इस मामले पर सुनवाई अभी पूरी नहीं हुई है। उपलब्ध ताजा रिपोर्ट के मुताबिक अगली सुनवाई 22 सितंबर 2026 को होगी। फिलहाल शीर्ष अदालत ने चुनाव आयोग के फैसले को रद्द या बरकरार रखने का अंतिम निर्णय नहीं दिया है।