झारखंड हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में 24 वर्षीय युवक का डीएनए टेस्ट कराने की पिता की मांग खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि जब बच्चा बालिग हो चुका है, तो उसे उसकी इच्छा के विरुद्ध डीएनए टेस्ट कराने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। साथ ही, यदि वह टेस्ट से इनकार करता है तो इसका कोई प्रतिकूल निष्कर्ष (Adverse Inference) उसकी मां के खिलाफ भी नहीं निकाला जा सकता।
मामला गिरिडीह के एक दंपति से जुड़ा है। पति ने आरोप लगाया था कि वह वर्ष 2001 से 2002 तक गुजरात के सूरत में नौकरी कर रहा था। घर लौटने पर उसने पत्नी को गर्भवती पाया और उस पर विवाहेतर संबंध (Adultery) का आरोप लगाया। इसके बाद उसने 2008 में तलाक की याचिका दायर की और 2010 में बेटे का डीएनए टेस्ट कराने की मांग की, ताकि अपने आरोप साबित कर सके। हालांकि, फैमिली कोर्ट ने यह मांग खारिज कर दी थी।
फैमिली कोर्ट के फैसले के खिलाफ पति ने 2012 में हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। लेकिन लंबी कानूनी प्रक्रिया के दौरान बेटा बालिग होकर 24 वर्ष का हो गया। इस बीच उसे मामले में पक्षकार (Party) भी नहीं बनाया गया।
न्यायमूर्ति अनुभा रावत चौधरी ने अपने फैसले में कहा कि नाबालिग होने पर बच्चे की ओर से मां डीएनए टेस्ट के लिए सहमति दे सकती थी, लेकिन अब वह अधिकार समाप्त हो चुका है। चूंकि बेटा वयस्क है और मामले का पक्षकार भी नहीं है, इसलिए अदालत उसे डीएनए टेस्ट कराने का आदेश नहीं दे सकती। अदालत ने यह भी कहा कि केवल संदेह या संभावनाओं के आधार पर बच्चे की वैधता पर सवाल नहीं उठाया जा सकता।
हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के 2011 के आदेश को सही ठहराते हुए पति की याचिका खारिज कर दी और करीब 14 साल से चल रहे इस कानूनी विवाद का अंत कर दिया।