20% तक पानी की बचत, प्रति एकड़ 5 हजार रुपये कम होगी लागत; कम बारिश वाले क्षेत्रों में दलहन-तिलहन की खेती की सलाह
रायपुर। खरीफ सीजन में अल-नीनो के संभावित प्रभाव के चलते मानसून के देर से आने, जल्दी समाप्त होने, खंड वर्षा और अल्प वर्षा की आशंका को देखते हुए छत्तीसगढ़ सरकार ने किसानों के लिए व्यापक आकस्मिक कार्ययोजना तैयार की है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व और कृषि मंत्री रामविचार नेताम के मार्गदर्शन में तैयार इस योजना का उद्देश्य कम वर्षा की स्थिति में भी फसलों की सुरक्षा, उत्पादन बनाए रखना और खेती की लागत कम करना है।
कृषि विभाग ने किसानों को कम और मध्यम अवधि में पकने वाली फसलों की किस्मों का चयन करने की सलाह दी है, ताकि मौसम की अनिश्चितता का असर कम हो। विभाग ने विशेष रूप से धान की पारंपरिक रोपा पद्धति के बजाय डायरेक्ट सीडेड राइस (डीएसआर) तकनीक अपनाने पर जोर दिया है।
डीएसआर तकनीक के बड़े फायदे
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार डीएसआर तकनीक अपनाने से लगभग 20 प्रतिशत पानी की बचत होती है। इसके साथ ही प्रति एकड़ करीब 5,000 रुपये तक लागत कम आती है और फसल 12 से 15 दिन पहले तैयार हो जाती है। इससे किसानों को कम पानी में भी बेहतर उत्पादन लेने में मदद मिल सकती है।
कम बारिश वाले क्षेत्रों में दलहन-तिलहन की खेती करें
सरकार ने उच्च भूमि वाले क्षेत्रों में धान की जगह अरहर, मूंग, उड़द जैसी दलहनी फसलों तथा मूंगफली, तिल, रामतिल और सोयाबीन जैसी तिलहनी फसलों की खेती अपनाने की सलाह दी है। ये फसलें कम पानी में भी बेहतर उत्पादन देती हैं और किसानों का जोखिम कम करती हैं।
जल संरक्षण और खेत की तैयारी पर जोर
किसानों से वर्षा शुरू होने से पहले खेतों और मेड़ों की सफाई, समय पर जुताई तथा मेडबंदी कर वर्षा जल संरक्षण सुनिश्चित करने की अपील की गई है। इसके अलावा कतार पद्धति से बुवाई करने की सलाह दी गई है, जिससे खरपतवार नियंत्रण, नमी संरक्षण और पौधों की बेहतर वृद्धि संभव होती है।
बीज उपचार और बुवाई का विशेष सुझाव
कृषि विभाग ने बुवाई से पहले बीज उपचार को अनिवार्य बताया है। यदि 15 जुलाई तक पर्याप्त अंकुरण नहीं होता है, तो पुनः बुवाई के समय सामान्य से 10 प्रतिशत अधिक बीज उपयोग करने की सलाह दी गई है। वहीं जुलाई के अंत तक मूंग और उड़द, जबकि अगस्त में तिल, सूरजमुखी और मध्यम अवधि की अरहर की बुवाई करने का सुझाव दिया गया है।
उर्वरकों का संतुलित उपयोग करें
कम वर्षा की स्थिति में नत्रजन उर्वरकों का सीमित उपयोग करने और 2 प्रतिशत यूरिया घोल के पर्णीय छिड़काव या प्रति एकड़ दो बोतल नैनो यूरिया के प्रयोग की सलाह दी गई है। दलहनी एवं तिलहनी फसलों में बुवाई के लगभग एक माह बाद 2 प्रतिशत डीएपी घोल का पर्णीय छिड़काव लाभकारी बताया गया है।
जल संग्रहण और वैज्ञानिक सलाह लेने की अपील
सरकार ने किसानों से गांवों में नालों पर अस्थायी बांध बनाने, डबरियों, तालाबों और कुओं में वर्षा जल संग्रह करने तथा आवश्यकता पड़ने पर इसी जल का जीवन रक्षक सिंचाई के रूप में उपयोग करने का आग्रह किया है। साथ ही मौसम पूर्वानुमान के आधार पर कृषि कार्य करने, ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी सूक्ष्म सिंचाई तकनीक अपनाने तथा फसल विविधीकरण पर जोर देने की अपील की गई है।
कृषि विभाग ने किसानों से किसी भी प्रकार की कृषि संबंधी समस्या होने पर निकटस्थ कृषि महाविद्यालय, अनुसंधान केंद्र, कृषि विज्ञान केंद्र या कृषि विभाग से संपर्क कर वैज्ञानिक सलाह लेने का आग्रह किया है।