चीन-रूस की बढ़ती सैन्य साझेदारी से भारत की चिंता बढ़ी…

संयुक्त युद्धाभ्यास, हथियार सहयोग और रणनीतिक तालमेल से एशिया-प्रशांत में बदल रहा शक्ति संतुलन

नई दिल्ली। चीन और रूस के बीच सैन्य सहयोग लगातार मजबूत होता जा रहा है, जिसमें संयुक्त युद्धाभ्यास, हथियारों की खरीद-फरोख्त और समुद्री गश्त जैसी गतिविधियाँ शामिल हैं। इस बढ़ते सैन्य तालमेल को लेकर भारत की रणनीतिक चिंताएँ भी बढ़ती दिखाई दे रही हैं।

भारत लंबे समय से रूस से सैन्य उपकरणों और हथियारों का प्रमुख खरीदार रहा है। अनुमान के अनुसार, भारतीय सशस्त्र बलों में आज भी लगभग 60 प्रतिशत उपकरण रूसी मूल के हैं। ऐसे में आशंका जताई जा रही है कि रूस और चीन के बीच बढ़ते रक्षा सहयोग से संवेदनशील तकनीकी जानकारी चीन तक पहुँच सकती है, जिससे उसकी सैन्य क्षमता और विश्लेषण क्षमता को बढ़ावा मिल सकता है।

इसके अलावा यह भी चिंता व्यक्त की जा रही है कि किसी संभावित संकट की स्थिति में रूस, चीन के दबाव में भारत को हथियारों की आपूर्ति या समर्थन को सीमित कर सकता है, जिससे भारत की रक्षा तैयारियों पर असर पड़ सकता है।

युद्धाभ्यास का रणनीतिक महत्व

चीन और रूस का यह संयुक्त नौसैनिक अभ्यास क़िंगदाओ के पास यलो सी में आयोजित किया जा रहा है, जो दक्षिण कोरिया के नजदीक स्थित है। यह क्षेत्र ताइवान और जापान के भी करीब है, जहां पहले से ही क्षेत्रीय तनाव बना हुआ है।

विश्लेषकों के अनुसार, यह अभ्यास सिर्फ सैन्य सहयोग नहीं बल्कि एक रणनीतिक संदेश भी है, जो अमेरिका के सहयोगी देशों और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र के शक्ति संतुलन को प्रभावित करने की क्षमता रखता है।

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