राज्य वित्त आयोगों की कमजोर व्यवस्था से प्रभावित हो रहा स्थानीय विकास, सुधारों की जरूरत पर जोर
नई दिल्ली। देश में पंचायतों और नगर निकायों को वित्तीय रूप से मजबूत बनाने के लिए गठित राज्य वित्त आयोग (SFC) अपनी अपेक्षित भूमिका नहीं निभा पा रहे हैं। एक हालिया अध्ययन में सामने आया है कि कई राज्यों में आयोगों का गठन समय पर नहीं होता, उनकी रिपोर्टें वर्षों तक लंबित रहती हैं और सिफारिशों का पूरा पालन भी नहीं किया जाता। इससे स्थानीय निकायों को मिलने वाले वित्तीय संसाधनों और विकास कार्यों पर असर पड़ रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि पंचायतों और नगर निगमों को संविधान के 73वें और 74वें संशोधन के तहत अधिक अधिकार और वित्तीय संसाधन देने की व्यवस्था की गई थी। इसके लिए प्रत्येक राज्य में हर पांच वर्ष में राज्य वित्त आयोग का गठन अनिवार्य है, लेकिन अधिकांश राज्यों में इस प्रक्रिया का पालन नियमित रूप से नहीं हो रहा। एक अध्ययन के अनुसार, केवल कुछ ही राज्य ऐसे हैं जिन्होंने समय पर सभी राज्य वित्त आयोगों का गठन किया है।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि स्थानीय निकायों से जुड़े आंकड़ों (डेटा) की कमी एक बड़ी चुनौती है। कई राज्यों में राजस्व, संपत्तियों, कर संग्रह और विकास योजनाओं से संबंधित अद्यतन आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। इसके कारण वित्तीय आवंटन और संसाधनों के वितरण में पारदर्शिता तथा प्रभावशीलता प्रभावित होती है।
विशेषज्ञों ने सुधार के लिए कई सुझाव दिए हैं। इनमें राज्य वित्त आयोगों का समयबद्ध गठन, उनकी सिफारिशों को लागू करने की बाध्यकारी व्यवस्था, स्थानीय निकायों का डिजिटल डेटा बेस तैयार करना, वित्तीय पारदर्शिता बढ़ाना और अनुदानों के वितरण के लिए स्पष्ट एवं सूत्र-आधारित प्रणाली अपनाना शामिल है।
जानकारों का मानना है कि यदि राज्य वित्त आयोगों को अधिक प्रभावी बनाया जाए तो पंचायतों और नगर निकायों को पर्याप्त वित्तीय संसाधन मिल सकेंगे, जिससे स्थानीय स्तर पर सड़क, पानी, स्वच्छता, स्वास्थ्य और अन्य बुनियादी सुविधाओं के विकास को गति मिलेगी।