लद्दाख की चार मांगों पर फिर घमासान, केंद्र की बैठक के बाद सोनम वांगचुक का आंदोलन का अलर्ट…

राज्य का दर्जा, संवैधानिक सुरक्षा समेत चार मुद्दों पर अटका मामला; दिल्ली बैठक में ठोस प्रस्ताव नहीं मिलने से नाराज लद्दाखी प्रतिनिधि, 19 सितंबर से फिर आंदोलन की चेतावनी

नई दिल्ली/लेह। लद्दाख के राजनीतिक और संवैधानिक भविष्य को लेकर केंद्र सरकार और क्षेत्रीय प्रतिनिधियों के बीच खींचतान एक बार फिर तेज हो गई है। लेह एपेक्स बॉडी (LAB) और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (KDA) लंबे समय से लद्दाख के लिए व्यापक संवैधानिक और राजनीतिक सुरक्षा की मांग कर रहे हैं। इस मुद्दे पर हाल में दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्रालय के साथ हुई बैठक के बाद भी कोई ठोस लिखित प्रस्ताव सामने नहीं आने से प्रतिनिधियों में नाराजगी बढ़ गई है।

पर्यावरण कार्यकर्ता और लद्दाख आंदोलन के प्रमुख चेहरों में शामिल सोनम वांगचुक ने भी बातचीत के बाद निराशा जताई है। उनका कहना है कि बैठक का माहौल भले ही सौहार्दपूर्ण रहा, लेकिन मूल मुद्दों पर अपेक्षित प्रगति नहीं हुई।

क्या हैं लद्दाख की चार प्रमुख मांगें?

लद्दाख के प्रतिनिधियों की मांगों का केंद्र क्षेत्र को राजनीतिक अधिकार और स्थानीय लोगों के हितों की संवैधानिक सुरक्षा देना है। आंदोलन से जुड़े संगठनों की प्रमुख मांगों में पूर्ण राज्य का दर्जा, संविधान की छठी अनुसूची के तहत सुरक्षा, स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार से जुड़े अधिकार और राजनीतिक प्रतिनिधित्व को मजबूत करना शामिल रहा है।

1. लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा

लद्दाख को मौजूदा केंद्र शासित प्रदेश के बजाय पूर्ण राज्य का दर्जा देने की मांग लंबे समय से उठ रही है। इसके साथ विधानसभा की स्थापना भी आंदोलन की प्रमुख मांग रही है।

प्रतिनिधियों का तर्क है कि स्थानीय स्तर पर चुनी हुई सरकार और विधायी व्यवस्था होने से क्षेत्र के लोगों को अपने प्रशासन और विकास से जुड़े फैसलों में अधिक प्रभावी भूमिका मिल सकेगी।

2. छठी अनुसूची जैसी संवैधानिक सुरक्षा

दूसरी बड़ी मांग लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची के तहत सुरक्षा देने की है। इसका उद्देश्य स्थानीय समुदायों की जमीन, संस्कृति, भाषा और पारंपरिक अधिकारों को संरक्षण देना है।

हालांकि, हाल की बातचीत में केंद्र की ओर से अनुच्छेद 371(K) के जरिए लद्दाख के लिए विशेष संवैधानिक प्रावधान तैयार करने का विकल्प चर्चा में आया है। रिपोर्टों के मुताबिक इसका उद्देश्य क्षेत्र को कुछ विशेष सुरक्षा देना है, लेकिन इसके तहत प्रशासनिक और विधायी शक्तियां कितनी होंगी, इस पर अभी स्पष्टता बाकी है।

3. स्थानीय लोगों के लिए रोजगार और अधिकार

लद्दाख के संगठनों की एक अहम चिंता स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार और सरकारी सेवाओं में पर्याप्त अवसर सुनिश्चित करना है। क्षेत्र की विशिष्ट परिस्थितियों और सीमित रोजगार अवसरों को देखते हुए स्थानीय युवाओं के लिए सुरक्षा की मांग लगातार उठती रही है।

केंद्र की ओर से पहले स्थानीय निवास और रोजगार से जुड़े नियमों में बदलाव किए गए हैं, लेकिन आंदोलनकारी संगठन इसे अपनी व्यापक मांगों का पूरा समाधान नहीं मानते।

4. मजबूत राजनीतिक प्रतिनिधित्व

लद्दाख में प्रभावी राजनीतिक प्रतिनिधित्व भी विवाद का बड़ा मुद्दा है। क्षेत्र के प्रतिनिधि चाहते हैं कि स्थानीय स्तर पर ऐसा लोकतांत्रिक ढांचा हो, जिसमें जमीन, संस्कृति, पर्यावरण और विकास से जुड़े महत्वपूर्ण फैसलों में स्थानीय निर्वाचित प्रतिनिधियों की निर्णायक भूमिका हो।

हाल की बातचीत में केंद्र ने एक निर्वाचित यूटी-स्तरीय निकाय की संभावना पर चर्चा की है। प्रस्तावित निकाय को जमीन, संस्कृति, भाषा, वन और पर्यावरण जैसे विषयों पर अधिकार देने की बात सामने आई है।

दिल्ली की बैठक में क्या हुआ?

केंद्र और लद्दाखी प्रतिनिधियों के बीच हाल की बैठक में नए शासन ढांचे को लेकर कई सवालों पर चर्चा हुई। इनमें प्रस्तावित निकाय का स्वरूप, उसकी शक्तियां और मौजूदा जिला परिषदों के साथ उसका संबंध जैसे मुद्दे शामिल थे।

लेकिन लद्दाख के प्रतिनिधियों की शिकायत है कि बैठक में उनकी अपेक्षा के अनुरूप कोई स्पष्ट लिखित ड्राफ्ट या ठोस प्रस्ताव नहीं दिया गया। इसी वजह से बातचीत के बाद असंतोष सामने आया।

सोनम वांगचुक ने बैठक के माहौल को सौहार्दपूर्ण बताते हुए यह संकेत दिया कि केवल बैठक होने से समस्या का समाधान नहीं होगा, बल्कि मांगों पर स्पष्ट निर्णय और लिखित आश्वासन जरूरी है।

केंद्र के सामने क्या है चुनौती?

केंद्र सरकार के सामने एक तरफ लद्दाख की राजनीतिक और संवैधानिक मांगों को संबोधित करने की चुनौती है, तो दूसरी तरफ ऐसा प्रशासनिक ढांचा तैयार करना है जो क्षेत्र की स्थानीय जरूरतों के साथ-साथ राष्ट्रीय हितों को भी ध्यान में रखे।

लद्दाख का सामरिक महत्व, सीमावर्ती स्थिति, पर्यावरणीय संवेदनशीलता और स्थानीय पहचान इस पूरे विवाद को सामान्य प्रशासनिक सुधार से कहीं अधिक महत्वपूर्ण बना देते हैं।

हालिया रिपोर्टों के अनुसार केंद्र लद्दाख के लिए एक विशेष संवैधानिक व्यवस्था और निर्वाचित निकाय पर विचार कर रहा है, लेकिन उसके अधिकारों और स्वरूप को लेकर अभी बातचीत जारी है।

अब आंदोलन की राह पर लद्दाख?

बैठक के बाद लद्दाखी संगठनों ने संकेत दिया है कि यदि जल्द ठोस प्रस्ताव सामने नहीं आता, तो आंदोलन का रास्ता फिर अपनाया जा सकता है। रिपोर्टों के मुताबिक सोनम वांगचुक और उनके समर्थकों ने 19 सितंबर से नए आंदोलन की चेतावनी दी है।

इससे साफ है कि लद्दाख का मुद्दा फिलहाल शांत नहीं हुआ है। आने वाले दिनों में केंद्र की ओर से प्रस्तावित संवैधानिक और प्रशासनिक ढांचे पर होने वाली अगली बातचीत यह तय कर सकती है कि दोनों पक्ष किसी सहमति तक पहुंचते हैं या आंदोलन फिर तेज होता है।

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