आंसुओं का मिलन… 11 महीने बाद भिलाई के आश्रम में मिली मां, बेटी से मिलते ही छलक पड़े आंसू
भिलाई। भिलाई के सेक्टर-1 स्थित फील परमार्थ आश्रम में मंगलवार को एक बेहद भावुक दृश्य देखने को मिला। 11 महीने से लापता मां की तलाश में दर-दर भटक रही बेटी का संघर्ष आखिरकार सफल हुआ और मां-बेटी का मिलन आंसुओं के बीच हुआ। इस दृश्य को देखकर आश्रम में मौजूद लोग भी भावुक हो गए।
यह सच्ची घटना बिहार के भागलपुर की रहने वाली 65 वर्षीय बबीता देवी और उनकी इकलौती बेटी पूजा की है। बबीता देवी 3 जून 2025 को अपने मायके जगतपुर (बांका) जाने के लिए घर से निकली थीं। जाते समय उन्होंने बेटी पूजा से कहा था कि वह 10 दिनों में वापस लौट आएंगी, लेकिन इसके बाद वह घर नहीं पहुंचीं।
मां के अचानक लापता होने से पूजा की जिंदगी जैसे थम गई। पहले ही पिता के गुम होने का दर्द झेल चुकी पूजा के लिए यह दूसरा बड़ा सदमा था। पूजा के जन्म से पहले ही उसके पिता पूर्णदेव सिंह, जो सेंट्रल कोलफील्ड्स लिमिटेड में मैनेजर थे, उनका अपहरण हो गया था और वे आज तक नहीं मिले। पति के गुम होने के बाद भी बबीता देवी ने हिम्मत नहीं हारी और अपनी बेटी की परवरिश की। मां-बेटी ही एक-दूसरे की पूरी दुनिया थीं।
इसी वजह से जब मां गायब हुईं तो पूजा ने उन्हें खोजने के लिए हर संभव कोशिश शुरू कर दी। उसने भागलपुर, पूर्णिया, कटिहार और नौगछिया समेत कई शहरों के वृद्धाश्रमों में तलाश की। रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड, मंदिर और सड़कों तक पर मां को खोजा। उसने खुद पोस्टर छपवाकर जगह-जगह चिपकाए और पुलिस थानों में जाकर मदद की गुहार लगाई।
मां की तलाश में पूजा ने अपनी नौकरी तक छोड़ दी। हर दिन उसे यही उम्मीद रहती कि शायद अगली कॉल मां के मिलने की खबर लेकर आएगी।
इधर, भिलाई से करीब 15 किलोमीटर दूर भटकती हुई बबीता देवी भिलाई स्थित फील परमार्थ आश्रम पहुंच गई थीं। आश्रम के मुख्य सेवक अमित राज उन्हें अपने साथ आश्रम ले आए। यहां भी बबीता देवी दिन-रात सिर्फ एक ही बात दोहराती रहीं “मुझे घर जाना है… गेट खोल दो…” लेकिन वह अपना पूरा पता नहीं बता पा रही थीं।
आखिरकार 10 मई को उनकी धुंधली यादों में ‘जगतपुर बांका’ नाम उभरा। इसके बाद आश्रम की टीम ने तुरंत बांका पुलिस से संपर्क किया। 11 मई की सुबह पूजा के पास फोन आया कि उसकी मां भिलाई के एक आश्रम में सुरक्षित हैं।
यह खबर सुनते ही पूजा रो पड़ी। उस समय वह एक कोचिंग संस्थान में थी। उसने छुट्टी मांगी, लेकिन मना कर दिया गया। इसके बावजूद वह तुरंत मां से मिलने के लिए निकल पड़ी।
जब आश्रम में मां-बेटी आमने-सामने हुईं तो दोनों एक-दूसरे से लिपटकर फूट-फूटकर रोने लगीं। 11 महीने का दर्द, इंतजार और संघर्ष आखिरकार आंसुओं के साथ खत्म हो गया।