तिरुचिरापल्ली में स्थापित पायलट प्लांट हर साल 100 टन ई-वेस्ट प्रोसेस करेगा, मूल्यवान धातुओं की पर्यावरण-अनुकूल रिकवरी होगी।
चेन्नई/तिरुचिरापल्ली। देश में बढ़ते इलेक्ट्रॉनिक कचरे (ई-वेस्ट) की समस्या से निपटने की दिशा में बड़ी सफलता मिली है। के शोधकर्ताओं ने एक स्वदेशी ई-वेस्ट प्रोसेसिंग पायलट प्लांट विकसित किया है, जिसकी क्षमता सालाना 100 टन ई-वेस्ट को प्रोसेस करने की है।
यह प्लांट के तिरुचिरापल्ली परिसर में स्थापित किया गया है। संयंत्र मुख्य रूप से प्रिंटेड सर्किट बोर्ड (PCB) को प्रोसेस करता है, जिन्हें ई-वेस्ट का सबसे जटिल और धातु-समृद्ध हिस्सा माना जाता है।
इस तकनीक की मदद से कॉपर, लेड और टिन जैसी मूल्यवान धातुओं की रिकवरी की जा सकेगी। खास बात यह है कि यह प्रक्रिया सिंगल-एसिड और जीरो-डिस्चार्ज तकनीक पर आधारित है, जिससे पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना धातुओं को निकाला जा सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, भारत में हर साल लाखों टन ई-वेस्ट उत्पन्न होता है। ऐसे में यह स्वदेशी तकनीक न केवल प्रदूषण कम करने में मदद करेगी, बल्कि मूल्यवान संसाधनों के पुनर्चक्रण और आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को भी मजबूती देगी।
IIT मद्रास के वैज्ञानिकों का कहना है कि यह मॉडल भविष्य में बड़े स्तर पर ई-वेस्ट प्रबंधन और क्रिटिकल मिनरल्स की रिकवरी के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।