भिलाई। हमारे जीवन में अधिकांश लोग वस्तुओं, पदार्थों, दृश्य और घटनाओं को केवल भोगने की प्रवृत्ति से देखते हैं। लेकिन स्वामी अवधेशानंद जी गिरी के अनुसार जीवन का उद्देश्य केवल भोग नहीं, बल्कि सही उपयोग होना चाहिए।
भोग हमेशा आत्मकेंद्रित प्रवृत्ति को बढ़ाता है, जबकि योग-समर्पण का मार्ग है। जब हम हर चीज को सिर्फ अपने लिए चाहते हैं, तब “मेरा-मेरा” की प्रवृत्ति जन्म लेती है। शास्त्रों में कहा गया है- ‘इदं न मम’ यानी “यह सब मेरा नहीं है।” यह भावना हमें संपत्ति, वस्तुओं और सुविधाओं के प्रति व्यापक दृष्टि देती है।
महापुरुषों की शिक्षा यही बताती है कि हमारे पास जो कुछ भी है, उसमें समाज और दूसरों का भी हिस्सा है। इसलिए जीवन में भोगने की नहीं, बाँटने की प्रवृत्ति अपनानी चाहिए।
जीवन का सही मार्ग यही है कि हम सिर्फ उपभोग न करें, बल्कि अपने पास उपलब्ध साधनों का उचित उपयोग करें। भोग नहीं, उपयोग की भावना जीवन को सार्थक बनाती है।
स्वामी जी का संदेश स्पष्ट है कहा कि अपनी चीजें केवल अपने लिए न रखें, उन्हें जरूरतमंद लोगों के साथ बाँटें। यही जीवन का वास्तविक धर्म और मानवता का मार्ग है।