दिल्ली। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में है। कैंपस में लगे “मोदी-शाह की कब्र खुदेगी” जैसे नारों ने न केवल सियासी तूफान खड़ा कर दिया, बल्कि अभिव्यक्ति की आज़ादी, विरोध की मर्यादा और विश्वविद्यालयों की भूमिका पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
यह मामला अब केवल छात्र राजनीति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति, न्यायिक फैसलों और वैचारिक ध्रुवीकरण से जुड़ गया है।
JNU में यह प्रदर्शन ऐसे समय हुआ, जब उमर खालिद और शरजील इमाम को लेकर न्यायिक प्रक्रिया चर्चा में है।
प्रदर्शन कर रहे छात्र-समूहों का दावा है कि वे न्याय व्यवस्था और सरकार की नीतियों के खिलाफ असंतोष जाहिर कर रहे थे। लेकिन नारे का स्वर इतना तीखा और प्रतीकात्मक रूप से हिंसक था कि उसने पूरे विमर्श की दिशा बदल दी। यहां सवाल विरोध करने का अधिकार नहीं, बल्कि विरोध की भाषा बन गया।
राजनीतिक इतिहास में प्रतीकात्मक भाषा का इस्तेमाल नया नहीं है, लेकिन
“कब्र खुदेगी” जैसे शब्द लोकतांत्रिक असहमति से आगे जाकर हिंसा के बिंब पैदा करते हैं।
दो नजरिए उभरते हैं:
- समर्थक तर्क: यह सत्ता के अंत का प्रतीकात्मक नारा है, राजनीतिक बदलाव की बात करता है, शारीरिक हिंसा की नहीं।
- आलोचक तर्क: यहीं से मामला नैरेटिव वॉर में बदल जाता है।
भाजपा ने इस घटना को तुरंत राजनीतिक हथियार बना लिया।पार्टी का कहना है कि यह प्रदर्शन उमर खालिद-शरजील इमाम के समर्थन में था और देशविरोधी सोच को दर्शाता है। BJP नेताओं ने इसे टुकड़े-टुकड़े गैंग, अर्बन नक्सल नेटवर्क जैसे शब्दों से जोड़ा। भाजपा का संदेश साफ है-यह केवल छात्र आंदोलन नहीं, बल्कि राष्ट्र और संवैधानिक व्यवस्था के खिलाफ चुनौती है।
कांग्रेस ने अपेक्षाकृत मध्यम और सावधान रुख अपनाया।पार्टी ने कहा कि छात्रों को असहमति और गुस्सा जाहिर करने का अधिकार है लेकिन साथ ही यह भी जोड़ा कि भाषा की मर्यादा टूटनी नहीं चाहिए।
कांग्रेस का यह रुख दोधारी तलवार जैसा है एक तरफ अभिव्यक्ति की आज़ादी का समर्थन दूसरी तरफ हिंसक प्रतीकों से दूरी, यही कारण है कि भाजपा कांग्रेस पर परदे के पीछे समर्थन का आरोप लगा रही है।
JNU जैसे केंद्रीय विश्वविद्यालयों से अपेक्षा होती है कि वे वैचारिक बहस के मंच बनें न कि राजनीतिक टकराव के अखाड़े, लेकिन हकीकत यह है कि छात्र राजनीति अब सीधे राष्ट्रीय राजनीति की प्रतिध्वनि बन चुकी है, हर नारा, हर पोस्टर टीवी डिबेट और सोशल मीडिया ट्रेंड तय करता है।
प्रशासन की भूमिका यहां बेहद संवेदनशील हो जाती है- क्या वह अभिव्यक्ति की रक्षा करे या अनुशासन लागू करे?
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की आज़ादी देता है लेकिन अनुच्छेद 19(2) के तहत उस पर उचित प्रतिबंध भी लगाता है, यही वह ग्रे-एरिया है जहां यह पूरा विवाद अटका है।
सवाल यह नहीं कि विरोध किया जा सकता है या नहीं बल्कि सवाल यह है कि क्या हर भाषा, हर प्रतीक लोकतंत्र के दायरे में आता है?
राजनीतिक ध्रुवीकरण का असर:
यह विवाद एक बार फिर दिखाता है कि देश में विचारधाराएं आमने-सामने हैं संवाद की जगह शब्द युद्ध ले रहा है-जहां एक पक्ष इसे क्रांतिकारी असहमति मानता है, वहीं दूसरा पक्ष इसे राज्य और समाज के लिए खतरा बता रहा है,यही ध्रुवीकरण भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी चुनौती बनता जा रहा है।
JNU का नारा एक घटना नहीं, एक संकेत है संकेत उस बढ़ती दूरी का, जहां असहमति और उग्रता आलोचना और अपमान
के बीच की रेखा धुंधली हो रही है।
लोकतंत्र में विरोध ज़रूरी है, लेकिन विरोध की भाषा यदि लोकतांत्रिक मूल्यों को ही कमजोर करने लगे तो वह आत्मघाती बन जाता है।
असली सवाल यही है:
क्या भारत में विरोध इतना सशक्त हो सकता है कि वह व्यवस्था को चुनौती दे, लेकिन इतना जिम्मेदार भी कि वह लोकतंत्र को चोट न पहुंचाए?
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