अगस्त में रूस ने भारत से करीब 1.20 लाख टन पेट्रोल खरीदा, रूसी रिफाइनरियों पर हमलों के बाद बढ़ी भारतीय ईंधन की मांग
नई दिल्ली। भारत और रूस के बीच तेल कारोबार ने इस समय एक दिलचस्प मोड़ ले लिया है। जिस रूस से भारत बड़े पैमाने पर कच्चा तेल खरीदता है, उसी रूसी कच्चे तेल को भारतीय रिफाइनरियां प्रोसेस करके पेट्रोल के रूप में वापस रूस भेज रही हैं। हाल के महीनों में रूस में पेट्रोल की उपलब्धता प्रभावित होने के बाद भारत से वहां ईंधन की आपूर्ति बढ़ी है।
रिपोर्टों के मुताबिक, अगस्त 2026 में रूस ने करीब 1.72 लाख टन पेट्रोलियम उत्पाद आयात किए, जिसमें भारत की हिस्सेदारी लगभग 70 प्रतिशत रही। यानी भारत रूस के लिए पेट्रोलियम उत्पादों का सबसे बड़ा बाहरी स्रोत बनकर सामने आया।
रूसी तेल भारत आता है, रिफाइनरी में बनता है पेट्रोल
भारत लंबे समय से रूसी कच्चे तेल का बड़ा खरीदार है। अगस्त में भी भारत ने रूस से बड़ी मात्रा में क्रूड आयात किया। भारतीय रिफाइनरियां इस कच्चे तेल को पेट्रोल, डीजल और दूसरे पेट्रोलियम उत्पादों में बदलती हैं।
अब कारोबार का एक हिस्सा ऐसा दिखाई दे रहा है जिसमें रूसी कच्चे तेल से तैयार पेट्रोल वापस रूस पहुंच रहा है। जून और जुलाई में भारत से रूस को करीब 16.6 लाख बैरल गैसोलीन भेजे जाने के आंकड़े सामने आए हैं।
रूस में पेट्रोल की कमी क्यों हुई?
रूस दुनिया के सबसे बड़े तेल उत्पादकों में शामिल है, लेकिन उसकी घरेलू रिफाइनिंग क्षमता पर हाल के महीनों में दबाव बढ़ा है। यूक्रेन की ओर से रूसी तेल रिफाइनरियों पर किए गए ड्रोन हमलों के कारण कई संयंत्रों का संचालन प्रभावित हुआ।
अगस्त में रूस की रिफाइनरी प्रोसेसिंग क्षमता घटकर करीब 38 लाख बैरल प्रतिदिन रह गई, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह लगभग 50 लाख बैरल प्रतिदिन थी। घरेलू उत्पादन प्रभावित होने से रूस को अपनी जरूरत पूरी करने के लिए बाहर से पेट्रोल मंगाना पड़ा।
नायरा एनर्जी का उदाहरण भी अहम
भारत से रूस जाने वाले पेट्रोल कारोबार में गुजरात स्थित वडिनार रिफाइनरी का नाम खास तौर पर सामने आया है। रिपोर्टों के अनुसार, नायरा एनर्जी की वडिनार रिफाइनरी मुख्य रूप से रूसी कच्चे तेल पर चल रही है और कंपनी में रूसी ऊर्जा कंपनी रोसनेफ्ट की 49 प्रतिशत हिस्सेदारी है।
कुछ कार्गो सीधे रूस पहुंचे, जबकि कुछ खेप तुर्की जैसे देशों के रास्ते आगे भेजे जाने की संभावना जताई गई है। हालांकि, हर खेप के अंतिम गंतव्य की स्वतंत्र पुष्टि करना आसान नहीं है।
क्या भारत को इससे बड़ा आर्थिक फायदा हो रहा है?
पहली नजर में यह कारोबार भारत के लिए फायदेमंद दिखाई देता है, लेकिन विशेषज्ञों के मुताबिक इसका मतलब यह नहीं है कि भारत को रूसी कच्चे तेल पर अचानक बड़ी कीमत की बढ़त मिल गई है।
रूसी क्रूड की कीमतों में हाल में पहले की तरह बड़ी छूट नहीं रही। इसके अलावा पेट्रोल को रूस तक पहुंचाने में माल ढुलाई, बीमा, ट्रांसशिपमेंट और अन्य खर्च भी शामिल होते हैं। इसलिए पेट्रोल के निर्यात मूल्य और कच्चे तेल की कीमत के अंतर को सीधे रिफाइनरी का मुनाफा नहीं माना जा सकता।
कितना बड़ा है यह ‘तेल का उल्टा चक्र’?
भारत रूस से रोजाना लाखों बैरल कच्चा तेल खरीद रहा है, जबकि रूस को वापस जाने वाला पेट्रोल उसके मुकाबले काफी कम मात्रा में है। इसलिए फिलहाल यह कारोबार इतना बड़ा नहीं है कि भारत-रूस के पूरे तेल व्यापार का संतुलन बदल दे।
फिर भी स्थिति इसलिए खास है क्योंकि दुनिया के बड़े कच्चे तेल उत्पादक रूस को ही पेट्रोल की जरूरत पड़ रही है और भारत उस जरूरत को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। रूस में रिफाइनरी उत्पादन प्रभावित रहने तक भारतीय रिफाइनरियों के लिए यह एक महत्वपूर्ण निर्यात अवसर बना रह सकता है।