बिलासपुर। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर स्थित गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय (GGU) में आयोजित एक साहित्यिक कार्यक्रम उस वक्त विवाद में बदल गया, जब विश्वविद्यालय के कुलपति खुद मंच से अपनी व्यक्तिगत कहानी सुनाने लगे। कार्यक्रम का उद्देश्य साहित्यिक विमर्श था, लेकिन कुलपति का संबोधन धीरे-धीरे निजी अनुभवों और आत्मकथा सरीखी बातों में बदल गया।
मंच पर मौजूद एक वरिष्ठ साहित्यकार ने जब शालीनता से कहा कि कार्यक्रम के मूल विषय पर लौटना चाहिए, तो यह बात कुलपति को नागवार गुज़री। इसके बाद कुलपति ने उसी साहित्यकार को मंच से हटाने और कार्यक्रम से बाहर जाने को कह दिया। यह पूरा घटनाक्रम वीडियो में रिकॉर्ड हो गया, जो अब सोशल मीडिया पर वायरल है।
घटना यहीं नहीं रुकी। एक साहित्यकार को इस तरह अपमानित किए जाने से आहत होकर कार्यक्रम में मौजूद अन्य साहित्यकार और प्रोफेसर भी विरोधस्वरूप उठकर बाहर चले गए। देखते-देखते साहित्यिक कार्यक्रम पूरी तरह बिखर गया और माहौल तनावपूर्ण हो गया।
इस घटना के बाद विश्वविद्यालय परिसर और साहित्यिक हलकों में सवाल उठ रहे हैं- क्या कुलपति का मंच को निजी कथा मंच में बदलना उचित था?
क्या असहमति जताने पर किसी साहित्यकार को सार्वजनिक रूप से निकालना सही है?
क्या यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और साहित्यिक गरिमा का अपमान नहीं है?
सोशल मीडिया पर कई लोग इसे साहित्यिक असहिष्णुता और पद के दुरुपयोग से जोड़कर देख रहे हैं।